あらすじ
साहित्य समाज का दर्पण होता है, जो समाज की वास्तविक स्थिति को प्रतिबिम्बित ही नहीं करता, अपितु उसकी दिशा एवं दशा को भी स्पष्ट रूप से दर्शाता है। व्यक्ति भी स्वयं को प्रकृति की मान्यता, विविध माध्यमों एवं कलारूपों में रचता और अभिव्यक्त करता है। सक्सेनाजी को विविध मंच पर बहुत सुना है। इनकी मधुर वाणी आज भी कानों में गूंजती है। संगीत में इनकी गहरी रुचि का भी पता था, किन्तु साहित्यिक लेखन की जानकारी होना सुखद अनुभूति है। वाणिज्य जैसे नीरस विषय से जुड़े होने के उपरांत भी साहित्य के प्रति इनकी अभिरुचि, नाटक व एकांकी लेखन के साथ-साथ निरन्तर कविताओं की रचना करना, इनके बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचायक है। सक्सेनाजी की भाषा एवं शैली सरल, सरस मगर चिंतन प्रधान है। कोई भी क्षेत्र इनकी कलम से अछूता नहीं रहा। कविताओं में जीवन एवं जगत के वृहत्तर संदर्भों को बहुत ही कुशलतापूर्वक समेट कर प्रस्तुत किया है। आज के संत्रस्त जीवन में, जहाँ परिवार टूट रहे हैं, कुछ आत्मीय क्षण प्रदान करती ये पंक्तियाँ- हम दो और हमारे दोय, ख़ूब बही ये तेज़ बयार मैं अरु बस मेरा परिवार, दरक रहा रिश्तों का प्यार (विदाई बेटों की) आली - आली हाँ है आली, बहना तो है बड़ी निराली बहन नहीं है जिस घर में भी, वो घर तो है ख़ाली - ख़ाली (बहना रानी)