Kavita Men Aurat, Aurat Men Kavita कविता में औरत, औरत में कविता
DrMohsinKhan
あらすじ
मैंने अपने लौकिक जीवन तथा साहित्यिक जीवन की यात्रा में 'कविता में औरत होने' का एहसास किया और 'औरत में कविता' होने की स्थिति का अनुभव किया है। यह अनुभव किसी के लिए बहुत सूक्ष्म हो सकता है, किसी के लिए मध्यम और किसी के लिए स्थूल, लेकिन मेरे लिए यह अनुभव सूक्ष्म होने के साथ-साथ मृदुल, थोड़ा कसैला और बहुत परेशान कर देने वाला भी है। जिस तरह कविता मानस को मथती है और भीतर का रचनाकार बेचैन हो उठता है; वैसी ही कुछ अनुभूति स्त्री के जीवन को देखकर भी होती है। मुझे लगता है कि कविता और औरत बहुत साथ-साथ, कभी एक-दूसरे में उतरते हुए, कभी एक-दूसरे से सटते, सिमटते हुए, कभी एक-दूसरे में गुंथकर एक हो जाती हैं, फिर अलग-अलग रास्तों पर निकल जाती हैं और फिर कहीं जाकर मिल जाती हैं। ये एक बिंब-प्रतिबिंब, स्याह-सफ़ेद, भीतर-बाहर की अकथ आकृति है। मुझे लगता है कि कविता और औरत में बहुत कुछ समानताएँ हैं, क्योंकि दोनों की धरती पीड़ा ही है। उन समानताओं को ध्यान में रखकर मेरे मानस में एक प्रश्न बार-बार आकर अटक जाता था कि हिन्दी में क्या कोई ऐसा काव्य-संग्रह है, जिसमें 'औरत के द्वारा औरत के विषय में कविता' लिखी गई हो? और 'पुरुषों के द्वारा औरत के विषय में कविता' लिखी गई हो? ऐसे संग्रह की तलाश मेरी नज़रें कई बार, कई जगह करती रहीं। मुझे इस संबंध में रिक्तता और शून्यता ही नज़र आई। इस रिक्तता, शून्यता और अनुपस्थिति को एक आकार देने की कोशिश इस काव्य संग्रह की संकलित कविताओं के संपादन के माध्यम से की जा रही है।