あらすじ
हमर छत्तीसगढ़ी भाखा के मिठास बड़ अनमोल हे । इंहा के नंदिया, खेत-खार, परबत, जंगल, अऊ हरियर मैदान जतका सुन्दर अऊ मन ल मोहने वाला हें ओतके इंहा के छत्तीसगढ़ी भाखा । अलग-अलग हिस्सा म अलग-अलग छत्तीसगढ़ी भाखा बोले जाथे, पर, सबके अपन अलग-अलग मिठास हे। स्नेही जन, दाई अऊ ददा के बिना हमर जिनगी के कोई तारनहार नही हे। दाई-ददा हा हमर बर भगवान बरोबर हे। नौ महिना ले दाई हा हमर नवा जीवन ल सिरजाय खातिर जिंदगी अऊ मौत के बीच झूलत रहिथे। नानपन से ले के हमर बड़े होवत ले बाबूजी हा हर पल हमर अनुशासन बनाये रखे ल कभु डॉंटथे, कभु दुलारथे, कभु समझाथे। घर म दाई हर देवी-देवता के पूजा-पाठ, उपवास अऊ अपन संस्कार से घर ल मंदिर बनाथे। होवत बिहिनिया गाँव में चहल-पहल शुरू हो जाथे, सब अपन-अपन काम म निकल जाथे, चिरई के चुंई-चुंई, कंउआ के कांव-कांव, कोइली के कुहू-कुहू के संग हमर नींद ह आंखी ले भाग जाथे। सांझ होवत गाय-गरूवा, छेरिया-बोकरी, बनिहार-भूतिहार सब घर में आ जाथे। इही ह हमर छत्तीसगढ़ के गाँव के दिनचर्या आय । बिहिनिया के रोज के दिनचर्या छत्तीसगढ़ के गाँव के रोज के दिनचर्या म शामिल हे। ‘‘दार-भात चूरत रहीस‘‘ ,‘‘चौरा म बइठे-बइठे‘‘ , ‘‘ जंगर चोट्टा‘‘ के रचना के माध्यम से कुछ हास्य रस परोसे के कोशिश करे हंव। बरसा रानी के गुस्सा ल शांत करे बर प्रार्थना अऊ प्रकृति के प्रचंड रूप ले बचाय बर हमर देश के सेना मन के योगदान ल घलु दरसाये के कोशिश करे हंव। घर म जब कोनो पहुना आथें त घर के सबो सदस्य मन खुशी मनाए लगथें। पहुना ला देवता बरोबर मानथे, अपन-अपन शक्ति अनुसार खूब आवभगत करथे। मन म कभू, ये भावना नही रहय कि ये पहुना ह कब भागय। ‘‘छिदी पाना के मुंदरी‘‘ म इही भावना ल दरसाये के कोशिश करे हंव। ‘‘फूलत बसंत हे‘‘, ‘‘चंदा-चंदैनी‘,‘‘ जय हो माता रानी‘‘, बेरा-उवत‘‘, मोर गाँव के बिहिनिया‘‘ , गोंदा के फूल‘‘, कविता के माध्यम से हमर गाँव के सुन्दरता के वर्णन करे के कोशिश करे हंव। आज गाँव ह शहरीकरण के तरफ बढ़त जात हे। एखर परिणाम ये होवत हे, के हमर घर अंगना म चुंई-चुंई करत नचइया चिरइ गुड़ेरिया घलो नंदावत हे। ‘‘मिट्ठू‘‘ के माध्यम से एक आजाद, खुला आसमान में घुमइया पंछी के पीरा ल बताये के कोशिश करे हंव। आशा हे आप मन ल मोर रचना पसंद आही। आप मन से निवेदन हे कि पढ़े के बाद एखर समीक्षा करके मोर वाट्सअप नंबर म अपन संदेशा भेजिहा।