あらすじ
"आप सभी मूर्धन्य साहित्यकारों, साहित्य प्रेमियों, एवं पाठकगण को सादर नमन करते हुए, श्रद्धा सुमनों के साथ यह काव्यांजलि अर्पित करती हूं । मेरा यह काव्य संग्रह.. संगिनी.. मूलतः मेरी एवं जनमानस की मनोभावनाएं हैं, जिन्हें शब्दों में पिरो कर, स्नेह से सुसज्जित एवं प्रेम से श्रृंगारित कर, आपके समक्ष लाने की चेष्टा की हूं। मेरी कविताएं स्वच्छंद हैं, इन्हें मैंने सीमाओं में नहीं बांधा है बस पिंजरे से छूटकर उन्मुक्त हवा में उड़ते हुए परिंदे की तरह ...मन की खुशी, दर्द, करुणा, दया, ममता आदि संवेदनाओं को समेटे हुए हैं। जैसे मन कभी-कभी आकाश को छू लेना चाहता है, तो कभी लहरों साथ तरंगित हो जाना चाहता है, कभी प्रियतम के लिए श्रृंगार करना चाहता है, तो कभी चुपके से रो लेना चाहता है, कभी बाह्य पीड़ा, रुदन और हाहाकार देखकर द्रवित हो जाता है, तो कभी देश के लिए मर मिट जाना चाहता है, मैंने उन्ही मनोभावों को, कलम से पन्नों पर उकेर कर अभिव्यक्त करने का भरसक प्रयास किया है, अगर मेरा यह सृजन आपके हृदय को स्पर्श कर सके या आपके होंठ पल भर के लिए भी मुस्कुराहट से खिल उठें, तो यह मेरे जीवन की एक बड़ी उपलब्धि के साथ साथ मेरी काव्यकृति... संगिनी की भी सार्थकता होगी। सदैव आपके स्नेह, प्यार और आशीर्वाद की आकांक्षी .... संगीता बनाफर "