あらすじ
भोर से सांझ तक का; भोर की आस का , रात्रि के अन्धकार का ; आस से निराश तक राही चलते चलते थक जातें हैं- सो जाते हैं. हर भोर में नयी आस लेकर फिर जाग उठते हैं, संघर्ष होता है और फिर थक कर सो जाते है. युहीं सब कुछ अपरिवर्तित सा चलता रहता है. भोर तो होती है परन्तु सांझ फिर आ जाती है. मेरे यह गीत भोर से जागे, दिन से संघर्ष किया, और फिर सांझ ने थपकी दे सुला दिया. यह गीत वास्तविकता के गीत हैं. यह सच है कि हर सांझ और रात्रि के बाद एक नयी भोर आती है परन्तु यह भी सच है कि प्रत्येक दिन रात्रि के अंधकार में खो जाता है. आने वाला कल किसे मालूम है. मैंने तो आज के गीत रचे हैं. अंजाम को जानते हुए भी जब हर दिन सुनहरी आस से प्रारंभ होता है तो फिर हम भी भोर से ही मंज़िल कि चिंता में क्यूँ लग जाते हैं? सांझ तो आएगी ही, उसको रोकना किसके बस में है? हमारा जीवन तो संघर्ष है, संघर्ष उस थकन से पूर्व जो सांझ को हमे घेर लेगी. बिना प्रेरणा, बिना शक्ति इंसान क्यूँ और कैसे संघर्ष कर सकेगा. नहीं मानव का जीवन अकेला उसका ही नहीं; उस पर उनका भी तो हक़ है जिसने उसे प्यार किया. प्यार, प्रेम--- स्नेह--- अपने हर रूप में वह एक महान शक्ति है, ऐसी शक्ति जिसके सामने से हर विषमता सर झुकाए निकल जाती है. कौन इंसान ऐसा होता है जिसने जीवन में यह दर्द महसूस नहीं किया हो? प्यार पाने और देने के लिए इन्सान खोजने कि आवश्यकता नहीं. हर इंसान के ह्रदय में एक दर्द होता है और मैंने उस दर्द को अपनाया और उसको दूर करने के लिए, बांटने के लिए प्यार का सन्देश इन गीतों में उतार दिया