あらすじ
"खामोशी के बोल" कहानी संग्रह हमारे आस पास लगातार घट रही घटनाओं पर बनी डॉक्युमेंटरी की तरह है। ऐसा लगता है जैसे हमारी जिंदगी से जुड़े कुछ पात्र साकार रूप को छोड़ कर शब्दों में समा गए हैं। लेखिका कंचन गुप्ता ने अपनी कहानियों के पात्रों को समाज के कई हिस्सों से छाँट कर निकाला है और शब्दों के जरिए उन्हें एक ऐसी जिंदगी दी है कि वो हम से सवाल पूछ सकें। हमें आइना दिखा सकें। और सबसे ऊपर हमारे व्यक्ति केंद्रित, स्वार्थ पूर्ण व्यवहार को झकझोर कर कुछ सोचने पर मजबूर कर सकें।इस संग्रह की कहानी ‘खामोशी के बोल’ एक स्त्री के भीतर के सन्नाटे की आवाज है। संग्रह का नाम इसी कहानी पर रखा गया है। इस कहानी की नायिका खुद को अभिव्यक्त करने के लिए ऐसे कैनवास की तलाश कर रही है जिस पर खुद को अभिव्यक्त करने वाले रंगों को भर सके। उसके भीतर एक सन्नाटा है। धर्म कर्म भी उसके भीतर के सन्नाटे को भरने का औजार है। लेकिन अंदर का सूनापन खत्म होता हुआ दिखाई नहीं देता है। हमारे पास पड़ोस में अपने सुनेपन से जूझती स्त्रिायों के अनगिनत उदाहरण मिल जायेंगे। ‘ये प्लेस्मेंट वाले’ कहानी प्लेस्मेंट का बोर्ड लगा कर ब्लैकमेलिंग के धंधे में जुटे लोगों के सच को उजागर करता है। दिल को चीरने वाली बात ये है कि इसके लिए गरीब औरतों को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। अच्छे भले परिवार टूट जाते हैं क्योंकि समाज को लांछन लगाने वालों को सुनने और मजा लेने की आदत पड़ गयी है। दहेज की कुप्रथा पर चोट करने वाली कहानी ‘परंपराओं का निर्वाह’ समाज में एक नयी सुबह का आगाज भी करती है। ‘काँच की चूड़ियाँ’, ‘इंसानियत की जात’, ‘रिहाई’ और ‘सिंदूर की तपिस’ इस संग्रह की महत्वपूर्ण कहानी है। इन कहानियों को आम बोलचाल की भाषा में लिखा गया है। भाषा और चरित्र दोनों ही से पाठक आसानी से जुड़ जाते हैं। शब्द जाल में कहानी के पात्रों को उलझाने की कोशिश कहीं भी नहीं की गयी है। लेकिन पात्र आप से संवाद करते हैं। किसी भी कहानी का पात्र अपने आप में सीमित नहीं है। पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि कहानी के पात्र आपको अपनी दुनियाँ में ले गए हैं। इसका कारण ये है कि ये पात्र किसी बाहरी दुनिया के या काल्पनिक नहीं हैं। वो हमारे बीच से हैं, बल्कि हमारे ही भीतर मौजूद हैं। वो आपको सम्मोहित करते हैं, बतियाते हैं, बहस करते हैं और आपके सामने कई सवाल छोड़ जाते हैंहिंदी में पुरुषों के मुकाबले महिला लेखकों की संख्या बहुत कम है, इसलिए महिला का अपना दर्द बहुत कम ही सामने आ पाता है। कंचन गुप्ता ने इस संग्रह के जरिए इस खाई को पाटने की कोशिश की है।।

