आपको कामयाबी मिले श्री प्रेमचन्द 'पुष्प' जी की नवीनतम परमार्थ किताब "मैं पवित्र कैसे बनूँ?" (भाग-2) के प्रकाशन पर बधाई एवं शुभकामना प्रेषित करता हूँ। कहते हैं कि चित्र अपना चरित्र स्वयं कहता है। उसी प्रकार श्री प्रेम चन्द 'पुष्प' जी की धार्मिक पुस्तकों के शीर्षक इनकी सोच की गहराई, आध्यात्मिकता, संस्कार-संस्कृति के प्रति इनकी रुची को दर्शाते हैं। जब व्यक्ति अलौकिक संवाद करने की स्थिति में आता है और परिपक्वता को प्राप्त करता है तब उसमें स्वतः जिज्ञासा प्रकट हो जाती है। "मैं पवित्र कैसे बनूँ ?" में चलता फिरता नर परमार्थ पर चलकर पवित्र कैसे बनूँ। इस उद्देश्य को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। बधाई आशा है आपकी सृजनात्मकता यूँ ही बनी रहेगी और साहित्य को समृद्ध करती रहेगी। डॉ. (मा.) मनमोहन शर्मा 'शरण' प्रधान संपादक, अनुराधा प्रकाशन नई दिल्ली
ISBN: 9788119872787ASIN: 8119872789
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