सत्य से मित्रता करना 'सत्संग' है। हम परम सत्य से मित्रता नहीं कर सकते, हमारे हिसाब से जो 'सत्य' है वहीं से शुरू करो, एक एक कदम आगे बढ़ो । मानव होना अपने आप में सुपर है, सुपरमैन होना ठीक नहीं है। *** मन्दिर के दरवाजे पर ही बैठा रहूँगा। मन्दिर के अन्दर जाऊँगा तो भगवान के बाहरी दर्शन हो जायेंगे, मुझे तो अन्तर में दर्शन चाहिए। न ओरिजिनल गृहस्थी बने, न ओरिजिनल भगत। स्वयं के साथ धोखा नहीं, स्वयं की गलती पर गुस्सा करना है। मैं निर्मल कैसे बनूँ ? (भाग-2/2) -
ISBN: 9788119872091ASIN: 8119872096
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