कर्मवीर भाऊराव पाटील
डॉ.मोहनपुं.जाधवDr.MohanP.Jadhav
あらすじ
महान शिक्षाविद् की जीवन गाथा प्राक्कथन ग्रामीण शिक्षा का बरगद का पेड़ भारत में प्राचीन काल से दो प्रकार की संस्कृतियों का अस्तित्व दिखाई देता है। (1) ब्राह्मण संस्कृति : ज्ञान पर आधारित संस्कृति (2) श्रमण संस्कृति: श्रम पर आधारित संस्कृति भगवान महावीर श्रमप्रधान संस्कृति के प्रतिनिधि हैं। कर्मवीर भाऊराव पाटील पर जैन धर्म के संस्कार होने से उन्होंने ‘कमाओ और पढ़ो’ इस श्रम प्रधान शिक्षा का पुरस्कार किया। श्रम से स्वाभिमान की रक्षा का पाठ छात्रों को पढ़ाया। कर्मवीर ने हमें क्या दिया? महाकवि भूषण ने एक प्रश्न किया है कि अगर शिवाजी न होते तो क्या होता? इस प्रश्न का उत्तर देते समय भूषण लिखते हैं- ‘राजन की हद्द राखी, तेगबल शिवराज, देव राखे देवल में, स्वधर्म राख्यो घर में। ‘ इस प्रकार अगर हम प्रश्न करेंगे कि कर्मवीर ने हमें क्या दिया? तो उत्तर होगा - कर्मवीर ने समाज परिवर्तन का महान सामाजिक कार्य किया। देहातों से शिक्षा के माध्यम से नया ग्रामीण नेतृत्व निर्माण किया। महाराष्ट्र का राजनीतिक नेतृत्व ग्रामीण लोगों के पास आया। अगर भाऊराव न होते तो परंपरागत ब्राह्मण नेतृत्व कायम होता। महाराष्ट्र के समाज सुधारकों की महान परंपरा और कर्मवीर: महाराष्ट्र में विद्या के समर्थक महात्मा फुले, बुद्धिवाद के समर्थक आगरकर, स्त्री शिक्षा के समर्थक महर्षि कर्वे, सामाजिक समता के समर्थक राजर्षि शाहू छत्रपति, अस्पृश्य उद्धारक भारत रत्न डॉ. आंबेडकर आदि ने महान कार्य किया है। ये महापुरुष महाराष्ट्र के दैवत हैं। कर्मवीर ने इन महापुरुषों के महान तत्त्वों को अपने कार्य के द्वारा सामान्य जनों तक पहुँचाकर नये महाराष्ट्र का निर्माण किया। कर्मवीर समन्वयवादी थे। नया राष्ट्रीय विचारधारा का समाज निर्माण करने के लिए, समाज परिवर्तन के लिए कर्मवीर ने शिक्षा का एक साधन के रूप में उपयोग किया। क्या इस कार्य में उन्हें सफलता मिली? निश्चित रूप में वे सफल हुए हैं। महाराष्ट्र में वैचारिक परिवर्तन आया, ग्रामीण महाराष्ट्र का विकास हो गया। एक समय महाराष्ट्र के तीन विश्वविद्यालय के बॅरिस्टर पी. जी. पाटील, अॅड. शंकरराव खरात और डॉ. दत्ताजी राव साळुंखे ये रयत के विद्यार्थी कुलपति बन गये थे। छत्रपति शिवाजी महाराज के वे अनन्य भक्त थे। सातारा का शिवाजी कॉलेज घाटे में चल रहा था। एक अमीर ने कर्मवीर के सामने प्रस्ताव रखा कि मैं पर्याप्त आर्थिक सहायता करूँगा, अगर आप कॉलेज का नाम बदलकर मेरी सूचना के अनुसार नाम परिवर्तन करेंगे तो। शिवप्रेमी भाऊराव ने प्रस्ताव ठुकरा दिया और कहा कि भाऊराव एक बार अपने पिता का नाम बदलेंगे पर छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम नहीं बदलेंगे। कर्मवीर याने आधुनिक भगीरथ। इस भगीरथ ने ज्ञान का प्रकाश ग्रामीण विभाग में पहचाकर महाराष्ट्र प्रकाशमान किया। विद्या से ही प्रगति हो सकती है यह सिद्ध करके महाराष्ट्र को जगा दिया। इस संदर्भ में शरीफ जाफर की काव्य पंक्तियाँ अधिक उचित लगती हैं। वे लिखते हैं. - ‘इन्सान वह नहीं है, जो हवा के साथ बदले। इन्सान वह है, जो हवा का रुख बदले।। ‘ इस ग्रंथ के मूल लेखक डॉ. द. ता. भोसले और अनुवादक डॉ. मोहन जाधव दोनों अपने-अपने विषय के अनुभवी और लोकप्रिय प्राध्यापक हैं, तथा दोनों रयत शिक्षण संस्था के विद्यार्थी हैं। मुझे पूरा भरोसा है कि हिंदी पाठक इस ग्रंथ का स्वागत करेंगे। कोल्हापुर 19 फरवरी, 2013 शिवजयंती - डॉ. वसंतराव मोरे महासचिव दक्षिण भारत हिंदी परिषद