あらすじ
"काँच कि गुड़िया " यह मेरी पंचम कृति है |जो मेरी आत्मकथा है |जिसमें मैंने अपने जीवन संघर्ष और अपने जीवन से जुड़े सुख दुःख के पलों को शब्दों में पिरोया है और इस किताब के रूप में धरोहर की भांति संजोने का प्रयास किया है |जो शायद कहीं ना कहीं मेरे और मेरे परिवार के बच्चों के लिए प्रेरणा का विषय है और अन्य बच्चों को भी इस किताब से कुछ ना कुछ प्रेरणा अवश्य मिलेगी ऐसा मेरा विश्वास है | इस किताब में एक नारी के जीवन संघर्ष के बारे में बताया गया है कि उसने कैसे जीवन के विपरीत परिस्थितियों से लड़कर अपने आप को सम्भाला है और आज ना केवल एक माँ के रूप में बल्कि एक सफल साहित्यकार के रूप में जानी पहचानी एवं मानी जा रही है | यह कोई कहानी नहीं है बल्कि गुड़िया अर्थात् मेरी जीवन गाथा है | जिसमें एक नादान मासूम सी लड़की जो बचपन से ही एक होनहार विद्यार्थी रही है, जिसने कभी दुःख शब्द का अर्थ भी नहीं जाना था वह किस तरह विवाह रूपी षड्यंत्र के जाल में फंसा ली जाती है कुछ उन लोगों के द्वारा जो ख़ुद को अपने ही कहलाते हैं | मग़र प्रताड़ित करने में इतने निर्दयी की आत्म काँप उठती है बताते हुए | इस किताब के पूर्व मेरी एक और किताब भी प्रिंसेप्स पब्लिकेशन से ही प्रकाशित हुई है "रंग प्रेम का " जो कि काव्य संग्रह है | जिसमें सौ काव्य रचनाओं का समावेश है |इस काव्य संग्रह में जहाँ ईश्वर से अलौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति है वहीं पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं प्राकृतिक प्रेम की झलक भी है | मेरे मन की अभिव्यक्ति को सरल,सहज व सुन्दर रूप में सजाने संवारने व एक प्यारी सी किताब का रूप देने के लिए प्रिंसेप्स पब्लिकेशन का बहुत बहुत धन्यवाद और आभार,जिनके कार्य की गुणवत्ता अप्रतिम है | ..... डॉ. राखी (गुड़िया )