あらすじ
इस पुस्तिका में आधुनिक युवाओं के मनोविज्ञान पर आधारित दो कहानियां हैं।पहली कहानी एक गर्ल्स हॉस्टल की है जिसमें चोरी हो जाती है। अंग्रेजों के जमाने की जेलर कही जाने वाली कॉलेज प्रिंसीपल किसी भी कीमत पर उसका पता लगाना चाहती हैं किंतु वे समझ नहीं पाती हैं कि चोरी किस चीज की हुई है। जब वे हॉस्टल की लड़कियों के सामान की तलाशी लेती हैं तो वे उनकी आंखें खुलती हैं और उन्हें पता चलता है कि जिस चीज को वे ढूंढ रही हैं, चोरी उसकी नहीं हुई, चोरी तो ऐसी-ऐसी चीजें हो गई हैं जिनके बारे में वे सपने में भी नहीं सोच सकती थीं। दूसरी कहानी 'डार्विन के सिद्धांत में मोड़' ऐसे बेरोजगार युवक पर केन्द्रित है जिसे डिग्री प्राप्त करने के बाद भी नौकरी नहीं मिलती किंतु वह डार्विन के सिद्धांत सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट के आधार पर स्वयं को समझाता रहता है। एक दिन वह अखबार में पढ़ता है कि सरकार बेरोजगार युवाओं को सर्वाइवल फण्ड देगी। यही वह बिंदु होता है जिसमें उसे डार्विन के सिद्धांत में मोड़ दिखाई देता है।