あらすじ
बुढ़िया का चश्मा भारतीय राजनीति तथा भारत में फैले भ्रष्टाचार पर एक करारा व्यंग्य है। यह लघु नाटिका एक ऐसी बुढ़िया के चारों ओर घूमती है जिसके अद्भुत चश्मे से मनुष्य के स्थान पर घड़ियाल, मगरमच्छ और गैण्डे दिखाई देते हैं। साइकिलों पर बंदर सवार हैं तो चिम्पैंजी कार चला रहे हैं। चिम्पैंजियों के कानों पर मोबाइल फोन लगे हुए हैं। पान की थड़ी पर कुछ भेड़िये, लक्कड़बग्घे और लोमड़े पान खा रहे हैं। यह दृश्य देखकर स्कूल मास्टर रामबाबू दंग रह जाते हैं। इस नाटिका में बुढ़िया दो भूमिकाओं में है। एक ओर वह अपने ही पुत्रों द्वारा छली गई भारत माता का प्रतीक है तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार और निर्धनता के जबड़े में पिस रही आम जनता के रूप में भी है। यह लघु नाटिका इक्कसवीं सदी के भारत की वास्तविक तस्वीर है जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर देने के लिये पर्याप्त है। इस कुहासे के बीच आशा की एक किरण शेष है। वह है इस देश का शिक्षक। यदि शिक्षक चाहे तो इस देश को फिर से उसी ऊँचाई पर ले जा सकता है जिस ऊँचाई के लिये यह देश सदियों से विख्यात है। रामबाबू उसी शिक्षक की भूमिका में हैं।