あらすじ
भारत की पावन धरा देवभूमि तथा तपोभूमि है। इस कारण यह वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, ब्रह्म आदि सब प्रकार की साधनाओं के सारे इष्टों का महासमन्वय क्षेत्र है और इन सवका प्रचार प्रसार यहाँ विराट-रूप से हुआ। दुसरी समस्त साधनाओं की तरह वैष्णवीय साधना का आनन्द प्रवाह भी यहाँ अपने भावोँ की मधुरिमा से उज्ज्वल है। इस अपार अमृतमय भाव-साधना का प्रमुख केन्ट्र है भगवान श्रीकृष्ण की बाल्यावस्था तथा किशोरावस्था की लीलाभूमि श्रीधाम वृन्दावन। इस वृन्दावन धाम में सुप्राचीन द्रापरयुग से लेकर आज तक अविराम रूप से अनन्त प्रेम माधुर्य के नित्य सदा जाग्रत श्रीविग्रह भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएँ अविराम रूप से निरन्तर चली आ रही है। यहाँ पुरूषोत्तम श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का प्रारम्भ बाल-गोपाल के रूप में सर्वप्रथम माता यशोदा की गोद से हुआ। तब से लेकर आज तक भारतीय साधना के समस्त भाव- धाराओं में अमृतमय आनन्दघन गोपाल जी के साधना अपने माधुर्य से उज्ज्वल है। यही कारण है कि आज भी भारतवर्ष के चारों ओर असंख्य महान साधक तथा महान साधिकाएँ व भक्त आनन्द मग्न होकर उनके प्राणप्रिय गोपालजी की नित्य सेवा में तल्लीन रहते हैं। द्रापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण ने वृन्दावन में अपने बाल लीलाओं के साथ ही साथ किशोरावस्था में श्रीराधारणी तथा उनकी सोलह सौ गोपियों के साथ रासलीला की थी। वह रास आज भी अप्राकृत रूप से तथा अपार्थिव माधुर्य से परिपूर्ण होकर प्रत्येक रात को निधिवन तथा सेवा कुंज में अनुष्ठित होता है और प्रत्येक पूर्णिमा की रात को वहाँ महारासलीला होती है। श्रीराधा तथा श्रीकृष्ण के अपार अनुग्रह से कोई कोई महासौभाग़्यशाली उस अमृतमयी लीला का दर्शन प्राप्त करते हैं। उन प्रत्यक्ष उनुभवों का वांगमय स्वरूप इस ग्रन्थ " वृन्दावन में आज भी घटने वाले चमत्कार" ( वृन्दावने आजो घटे अघटन )। इस ग्रन्थ में मूल रूप एक कठोर यथार्थवादिनी तथा युक्तिवादिनी तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण सम्पन्ना नारी कैसे मधु वृन्दावन में वात्सल्यरसघन- विग्रह बाल-गोपाल की अनन्त माधुरी के सम्पर्क में आकर उनके अप्राकृत लीलाओं के आंस्वादन से धीरे धीरे गोपाल साधिका में रूपान्तरित हो ग़यीं। समय के साथ- साथ उनको गोपाल के अमृतमय आनन्द स्वरूप के दर्शन तथा स्पर्श का महान सौभाग्य प्राप्त हुआ। गोपाल को मधुरतम लीलाओं का आस्वादन करते हुए साधिका ने महासिद्धि प्राप्त की। पर इस महासिद्धि को प्राप्त करने से पूर्व गोपाल ने उसकी कड़ी स कड़ी परीक्षा ली। एक-एक करके उसका हरेक अवलम्बन छीन लिया। पर फिर भी गोपाल साधिका ने गोपाल के प्रति सम्पूर्ण शरणागति का भाव रखते हुए पूर्ण निष्ठा से अपने ऊपर आये हुए समस्त संकटों तथा विपत्तियों के तूफाने का सामना किया। अन्ततः गोपाल तथा चिरकिशोर श्रीकृष्ण की अपार करुणा से वृन्दावन के निधिवन में परम अपार्थिव महारास का दर्शन, आनन्दमग्न चित्त से किया। गोपाल को अपार्थिव कृपा के अनुभवों का अभूतपूर्व विवरण है जिससे वह एक उच्चकोटि की साधिका बन गयी थीं। उस गोपाल साधिका ने स्वयं अपने मुख से अध्यात्म पथ के पथीकृत तथा आचार्य स्वरूप लेखक ताराशिस गंगोपाध्याय को अवगत करवाया है। साधिका को मुख से सुनी हुई अपार्थिव घटनाओं को लेखक ने अपनी सहज, सरल रचनात्मक शौली के द्वारा लिपिवद्ध किया है। उन अपूर्व कुशलता को लिपिवद्ध करते हुए उन्होंने वृन्दावन के समस्त पौराणिक तथा ऐतिहासिक विवरणों पर प्रकाश डाला है। इसके साथ-साथ इस सिद्धक्षेत्र के सारे प्रमुख मन्दिर, कुंज, वन तथा घाटों के महात्म का वर्णन इतनी कुशलता से किया है कि इसे पढ़कर घर बैठे मन ही मन वृन्दावन का दर्शन कर लेना संभव है। केवल इतना ही नहीं भारत के साधना क्षेत्र के इतिहास में तीर्थश्रेष्ठ वृन्दावन के अन्तर्निहित माधुर्य के स्वरूप को भी जान लेना संभव है। इस बात का भी अनुभव किया जा सकता है कि बंगाल के साधक कवि ने क्यों कहा - "आज भी वहाँ श्रीराधिका तथा श्रीकृष्ण नित्यलीला करते रहते हैं।