あらすじ
दलदल - उत्तर-आधुनिकवाद के दौर में धार्मिक मठों और डेरों पर राजनीति और अपराध के गठजोड़ का हावी हो जाना मात्र एक संयोग नहीं हैं, शोषण और स्वार्थ पर आधारित व्यवस्थाएँ ऐसे ही बनती-बिगड़ती हैं। उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर सामाजिक व्यवस्था में अप्रासंगिक हो जाने वाली नारी जैसे ही असुरक्षित मठों में सुरक्षा ढूँढ़ने निकलती है, वैसे ही 'दलदल' जैसे उपन्यास की पृष्ठभूमि तैयार होने लगती है। असुरक्षा में सुरक्षा ढूँढ़ने वाला पुलिस और कारागृह के संरक्षण में पहुँच ही जाता है, यही नियति है। एक बन्दिनी के जीवन वृत्तान्त में मानवीय संवेदनाओं, प्रशासनिक निष्ठुरता और सामाजिक व्यावहारिकता को ढूँढ़ता यह उपन्यास पुलिस के थानों और जेल की चारदीवारी के पीछे के रहस्यों को सहज ही उजागर कर देता है। अन्ततः यहीं स्थापित होता है कि काल की गति स्थिर है परन्तु उसकी थाह लेना मुश्किल है। नियति का मार्ग वृत्ताकार ज़रूर है परन्तु उसका निर्धारण करना दुष्कर है। सरल और सहज जीवन ही सुख का आधार है। आप राजनीति और डेरा संस्कृति की यात्रा के साक्षी बनने जा रहे हैं ।