あらすじ
क्रांतिकारी केशव : केशव बलिराम हेडगेवार हमारे अनुशीलन समिति के सदस्य थे। 1910 में जब वे कॉलेज में पढ़ा करते थे, तो कुछ अन्य महाराष्ट्रीय युवकों और नेशनल मेडिकल कॉलेज के छात्रों सहित हमारे क्रांति दल में शामिल हुए थे। मैं अपने पलायन के दिनों में उनके छात्रावास में भी रहा। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने पर अनुशीलन समिति के नेताओं ने सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में क्रांति के सूत्रपात का निर्णय किया। बोस के साथ दौरा और विचार-विमर्श करने के बाद मैं 1940 की एक दोपहर अचानक नागपुर में हेडगेवार के घर जा पहुंचा और पूछा, 'कालीचरण दा (क्रांतिकारी नाम) की याद है तुम्हें?' वे मुझसे लिपट गए। मैंने उनसे पूछा, 'आपकी स्वयंसेवी सेना में कितने लोग हैं?' उन्होंने कहा, 'साठ हजार।' मैंने कहा, 'इन सभी के साथ क्रांति संग्राम में कूदना पड़ेगा।' मैंने उन्हें सारी बातों से अवगत करवाया और सुभाषचंद्र बोस के भी इससे जुड़े होने का भी जिक्र किया। डॉ. हेडगेवार ने कहा, 'इन 60 हजार स्वयंसेवकों में कम उम्र के बालक हैं। मैंने उन्हें अभी विशेष रूप से प्रशिक्षित नहीं किया है।' मैंने कहा, 'ऐसा सुनहरा अवसर फिर हमारे जीवन में कभी नहीं आएगा। इस महायुद्ध के अवसर का लाभ उठाना ही पड़ेगा। आप अपने विश्वस्त लोगों को जैसे भी हो तैयार करें। दूसरे उत्साहित होकर स्वयं इस महायुद्ध में कूद पड़ेंगे।' मैं उनके साथ विचार-विनिमय कर काशी चला गया। नागपुर में हेडगेवार का एक छोटा सा घर था, मैं तब तक वहीं रहा था।' —त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती ****** 'सांडर्स हत्याकांड के बाद राजगुरु पुणे चले गए। वे क्रांतिकारी श्रीराम बलवंत सारगांवकर के पास पहुंचे। राजगुरु और सारगांवकर का डॉ. हेडगेवार से काशी में परिचय हुआ था, इसलिए राजगुरु नागपुर में डॉ. हेडगेवार से मिले। उस दौरान वे 10 से 20 दिनों तक डॉ. हेडगेवार के पास रहे।' —सत्यशील राजगुरु ******* 'भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 11 अगस्त, 1942 को पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने जा रहे जगतपति के पैर में गोली लगी। उन्होंने चिल्लाकर ब्रिटिश सिपाहियों से कहा, 'पैर में गोली क्या मारते हो, सीने पर मारो।' इसके बाद उनके सीने पर गोली मार दी गई।' —शिशिरकुमार लाल खरांटी, बिहार ******* 'चिमूर के भारत छोड़ो आंदोलन में हम सभी स्वयंसेवक कूद पड़े। नाग पंचमी के दिन विशाल जुलूस निकला। मैं बालाजी रायपुरकर के साथ चल रहा था। उन्होंने संघ गणवेश की काली टोली लगा रखी थी। ब्रिटिश अधिकारियों ने गोलियां चलाईं। मेरे सामने ही रायपुरकर को गोली लगी और वे शहीद हो गए।' —दत्तात्रेय गणेश पिंपळापुरे
