यह पुस्तक भगवान मार्कन्डेय ऋषि एवं हम सबके आराध्य प्रभु शिव को समर्पित है। इसमें ऋषि मृकंडु की पुत्रकामना है तो पुत्र मार्कन्डेय की तप साधना भी। भगवान शंकर का आशीष भी है तो जगत जननी माँ दुर्गा का बालक मार्कन्डेय के प्रति प्रेम भी। जिस प्रकार कण-कण में भगवान शंकर का वास है, उसी प्रकार कथा में रखे गए हमारे शब्द भी उसी जगत पालक शिव को समर्पित हैं। कथा को सिर्फ पौराणिक रूप न देकर उसे आज के वर्तमान परिवेश से जोड़ने का भरसक प्रयास भी किया गया है।