जगूड़ी की कविता में आप पहाड़ या हिमालय ढूँढ़ेंगे तो नहीं मिलेगा क्योंकि वो प्रकृति के कवि नहीं मनुष्य के कवि हैं। उनमें उत्तराखंड नहीं, उनके पहाड़ नहीं, जैसे कि कई कवि वहाँ के चित्रण से नहीं उभर सके, ऐसी बात जगूड़ी के कविता संसार में नहीं है। वो विशुद्ध मनुष्य कवि हैं। जगूड़ी की कविता के केन्द्र में जो संसार बनता है, उसमें वह सबसे अलग कवि हो जाते हैं। वह अवाम के कवि कहलाए जा सकते हैं। जगूड़ी की लोकप्रियता का एक कारण उनकी कविताओं में के इस गुण का होना भी है। जगूड़ी संस्कृत के प्रचंड विद्वान हैं लेकिन उन्होंने आम लोगों की भाषा में कविताएँ लिखी हैं। ये अलग बात है कि क्षेत्रीयता की पहचान लेखकीय स्तर पर काफी अहमियत रखती है।