"प्रभा खेतान ‘अन्या' हैं, 'दूसरी औरत' हैं और उसी पुरुष के द्वारा हाशिये पर रखी जाती हैं जिससे वह सबसे ज़्यादा प्रेम करती हैं। 'अन्या से अनन्या' स्त्री के हाशिये से केन्द्र में आने की कथा है जिसमें वह बबूल के काँटे चबाकर अपने ‘होने' को 'अर्थपूर्ण होने' में रूपान्तरित करती दिखती हैं। पितृसत्ता से विद्रोह करते हुए भी भारतीय स्थितियों में यह स्त्री मुक्ति और विवशता के बीच बहती एक बेचैन नदी है!" -शंभुनाथ