あらすじ
जब पहली बार किताब की पहली कविता मन में आकार ले रही थी, तो विचारों का एक सैलाब भीतर उमड़ रहा था—कुछ ठहरते, कुछ बह जाते।समझ ही नहीं आ रहा था कि शुरुआत कहाँ से करूँ।पर मन के भीतर एक बेचैनी थी,जो बार-बार लिखने के लिए उकसाती रही।मैंने अपने विचारों से कहा—ज़रा थम जाओ, थोड़ा ठहर कर आओ।फिर मैंने अपने मन कोएक माँ की आँखों से देखने की कोशिश की।शायद मेरे जैसी न जाने कितनी माँएँ होंगी,जो अपने बच्चे से हज़ारों बातें कहना चाहती हैं,पर शब्दों में ढाल नहीं पातीं।आज उन्हीं सभी माँओं की ओर से,मैं संसार के हर बच्चे के लिए मन की किताब से कुछ शब्द चुराकर उनके विचारों में भरना चाहती हूँ। मेरे लिए इस किताब को पूरा करना किसी खूबसूरत सपने के सच होने जैसा है। और अगर इन कविताओं में से कोई एक भी किसी एक मन को छू जाए, तो मुझसे अधिक सौभाग्यशालीइस संसार में कोई और नहीं होगा। आइए,माँ और बेटे के साथ ज़िंदगी के इस सफ़र पर निकलते हैं।काशी की यात्रा करते हैं।