あらすじ
थोड़ी उलझी हुई हूं, थोड़ी सुलझी हुई हूं, अपने आप में एक पहेली हूं, अपना मान ले, तेरी ही सहेली हूं, तेरे सवालों का, मैं ही तो जवाब हूं, पढ़ ले! मैं तेरी किताब हूं।। इस किताब के द्वारा मैं उन सबके मन में उतरना चाहती हूं जिन्होंने जीवन के उन पहलुओं को करीब से देखा है जिनको अक्सर इंसान नजर अंदाज़ कर जाता है। प्रेम, द्वेष, मिलना, बिछड़ना, रूठना, मनाना आदि कितने ही रसों से हमारा जीवन सरोबार है। इन रसों को आपके जीवन में भरने ही मैं इस किताब को आपके पास लाई हूं। आशा करती हूं आप सबको मेरी किताब पसंद आएगी। ए के अर्चना, हिंदी सभा अध्यक्षा, सैंट मैरिज सेंटेनरी डिग्री कॉलेज, सिकंदराबाद।
ISBN: 9789358504903ASIN: 9358504900