あらすじ
22 प्रतिज्ञाओं ने हमें ना तो धर्म का, ना समाज का, ना ही राजनीति का छोड़ा है । धर्म की इनसे ग्लानि हुई है । समाज में सौहार्द खत्म हुआ है । राजनीति में हम बहिष्कृत हो गए हैं । समाज का एकजुट न होने का यह भी एक कारण है । राम के विरोध में कौन खड़ा होना चाहेगा ? हिन्दुओं की तो स्पष्ट घोषणा है, "जो राम का नहीं, वह हमारा नहीं ।" सत्ता में भागेदारी किसके साथ मिलकर करना चाहते हो ? निकट भविष्य में आंबेडकरवादियों का पूर्ण रूप से सत्ता प्राप्त करना सम्भव नहीं है । पूर्ण रूप से भागेदारी का अर्थ है, अपना मुख्यमंत्री या अपना प्रधान मंत्री बन जाना । अभी केवल सत्ता में भागीदार ही हो सकती है । अनुसूचित/आंबेडकरवादियों का नेत्रत्न न तो पिछड़ा वर्ग स्वीकार करेगा, न ही हिन्दुओं का कोई वर्ग स्वीकार करेगा । अंबेडकरवादी वर्ग अब 22 प्रतिज्ञाओं के कारण समाज और राजनीति में अलग थलग पड़ चुका है । बगैर समाजिक ढांचे के स्वभाव को जाने समझे, न तो आप समाज में स्वीकार्य हो सकते हैं, न ही सत्ता की ओर कदम बढा सकते हैं ।...