あらすじ
"यद्यपि किन्नर-केंद्रित सिनेमा की शुरूआत बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक से हो गयी थी तथापि एतद्-विषयक नाटकां का प्रणयन इक्कीसवीं सदी से उपलब्ध होता है। इस दिशा में महेश दत्तानी द्वारा लिखित ‘आग के सात फेरे’ (2008) और हरीश बी.शर्मा के लघु नाटक ‘हरारत’ (2003) का ही संदर्भ मिलता है। किन्नर-केंद्रित प्रथम उपन्यास ‘यमदीप’ सन् 2002 में प्रकाशित हुआ है। स्पष्ट है कि हिंदी साहित्य की प्रायः समग्र विधाओं में किन्नर-केंद्रित रचनाओं का सृजन बीसवीं शताब्दी से ही प्राप्य है लेकिन मुझे भरत वेद द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक ‘शिखण्डी’ के 1996 में मंचन होने की जानकारी और प्रमाण ने हतप्रभ कर दिया। यद्यपि नाटककार भरत वेद ने सन् 1992 में इसका लेखन कर लिया था तथापि सन् 1996 से 1998 पर्यन्त तीन वर्षां में इसके पाँच मंचन का होना ऐतिहासिक घटना ही कही जाएगी। ‘शिखण्डी’ नाटक किन्नरों की दशा और दिशा की परिक्रमा करके उसके अस्तित्व के अन्वेषण और अस्मिता के गवेषण का गंतव्य है। इसमें पात्र नरमादा और कीरन नाम की सार्थकता को तो प्रकट करते ही हैं, किन्नरों की समस्याओं को समक्ष प्रस्तुत कर निदान निर्दिष्ट करने का उपक्रम भी निवेदित करते हैं। इसमें किन्नरों को निकट से निरखकर और उनकी समस्याओं को पास से परख कर कथानक का पट इस तरह तैयार किया गया है कि जन-मन संवेद्य होकर मानवता का मान रखने में संलग्न-सचेष्ट हों।"