あらすじ
समाज में वेश्या की मौजूदगी एक ऐसा चिरन्तन सवाल है जिससे हर समाज, हर युग में अपने-अपने ढंग से जूझता रहा है ! वेश्या को कभी लोगों ने सभ्यता की जरुरत बताया, कभी कलंक बताया, कभी परिवार की किलेबंदी का बाई-प्रोडक्ट कहा और कभी सभ्य, सफेदपोश दुनिया का गटर जो 'उनकी' काम-कल्पनाओं और कुंठाओं के कीचड़ को दूर अँधेरे में ले जाकर डंप कर देता है ! इधर वेश्याओं को एक सामान्य कर्मचारी का दर्जा दिलाये जाने की कवायद भी शुरू हुई है ! लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि समाज अपनी पूरी इच्छाशक्ति के साथ वेश्यावृत्ति के उन्मूलन के लिए कटिबद्ध हो जाए; इस अभिशाप के उन्मूलन के नाम पर तमाम तरह के उत्पीडन-दमन और शोषण का शिकार वेश्याएँ जरूर होती रही हैं ! यह उपन्यास वेश्याओं और वेश्यावृत्ति के पूरे परिदृश्य को देखते हुए हमारे भीतर उन असहाय स्त्रियों के प्रति करुणा का उद्रेक करता है, जो किसी भी कारण इस बदनाम और नारकीय व्यवसाय में आ फंसी हैं ! कलकत्ता के सोनागाछी रेड लाइट एरिया की अँधेरी गलियों का सीधा साक्षात्कार कराते हुए लेखिका सभ्य समाज की संवेदनहीनता और कठोरता को भी साथ-साथ झिन्झोद्ती चलती है; यही चीज इस उपन्यास को सिर्फ एक कथा-पुस्तक की हद से निकलकर एक दस्तावेज में बदल देती है !