あらすじ
लेखिका की कलम से... इश्क़ अंतरात्मा का स्वरूप हैं, हालाँकि इश्क़ कभी भी ज़बरदस्ती या मजबूर करके नहीं हो सकता। प्यार अनिवार्य रूप से आत्म-संबंध है: जो कई जन्मों के साथ का अहसास कराता है। जो इश्क़ में डूब जाता वो ख़ुद इक इबादत बन जाता, और महबूब उसका ख़ुदा। “तेरा सजदा” इश्क़ ने डूबे वही अल्फाज़ है जो गीत ग़ज़ल में ढाल कर इस काव्य संग्रह में उतारे हैं। सजदा सिर्फ़ खुदा का हो या अपने महबूब का ज़रूरी नही, सजदा अपने माता, पिता, गुरु, भाई, बहन आ अन्य किसी प्रिय व्यक्ति का भी किया जा सकता है। ये तो आपका लगाव है, जो आपके अनन्य की खुदा सा दर्ज़ा देता हैं। कभी कभी किसी के खो जाने या बिछड़ जाने से भी न ही इबादत कम होती ना ही उसका दर्जा। सच्चा प्रेम अजेय और अनूठा होता है, और यह शक्ति बटोरता और खुद को ब्रह्मांड तक फैलाता चला जाता है, जब तक कि अंततः यह इश्क़ हर उस प्रेमी को बदल कर अद्भुत कर देता, जिसके भी मन को छूता है। डॉ नीरू जैन