あらすじ
बड़े-बड़े शहरों में छोटी छोटी बातें होती रहती है।लेकिन हमारे छोटे से गाँव में बड़ी-बड़ी बातें होती रहती ह"भाई जी" चलो आज मैं आप लोगों को अपने गाँव ले चलता हूँ। यहाँ के लोगों से आपको रूबरू करता हूँ| कैसे-कैसे लोग हैं मेरे गाँव मे, हर एक शख्स से मैं आपको मिलवाता हूँ। मेरे गाँव का हर शख्स अपने आप में अलग ही पहचान बनाता हैं। कोई तुर्रमखा हैं, तो कोई हिटलर| कोई आदमी किसी को कुछ समझता ही नही है, भाई। हर एक आदमी आपने आप को हिटलर का पोता मानता है। दूसरे के फट्टे में टांग अड़ाने में यहाँ के लोगों को बड़ा ही मजा आता हैं, फिर चाहे टांग टूट कर उन्ही के पिछुवाड़े में ही क्यो न घुस जाये, और ऐसा कई बार हुआ भी है। इस गांव के लोग कट्टे (देशी तमंचा) और टट्टे कही भी पेलने के फिराक में रहते है। चाहे फिर कट्टे से गोली चले या न चले, और टट्टे बचे या न बचें। यहाँ के लोगों की सबसे बुरी आदत हैं बात-बात में कट्टा निकाल लेते हैं, गोलियां चल जाती हैं| चाहे वो गोलियां भरतुई ही क्यो न हो। लेकिन चल जाएँगीआज की बात तो सुन लीजिये, कल ही नए ग्राम प्रधान जी का चयन हुआ है, और आज ही अगले पंचवर्षीय चुनाव की योजना बनने लगी। लोग कहने लगे कि, नया प्रधान कुछ काम नही कर रहा है। उसको हटाओ और नया प्रधान बनाओ। साला अभी नए प्रधान के खाते में ग्रामविकास की पहली किस्त का पैसा भी नही आया हैं, उससे पहले उस प्रधान को हटाने के प्लान बनने लगे| बड़े अजीब लोग हैं यहाँ के| तब ही तो प्रधान समझ जाता है कि अगली बार तो हम जीतबे नही करबे, अबकी ही पूरी कमाई कर लेते हैं। सभी प्रधानों की एक ही सोच होती हैं, पहले अपना विकास, बाद में गाँव का। बाद में जब कुछ बचेगा ही नही तो गाँव का विकास घण्टा करेंगे| ठनठन गोपाल, अंगूठा दिखा कर कह देंगे सरकार पैसा देबो नही करिस तो विकास कैसे करी। अपना घर बेच कर हम विकास तो कर नही सकित। हम भी बाल बच्चे वाले हैं|अब आप लोग सोच रहे होंगे कि कोई आदमी अपने गाँव की बुराई कइसे बता सकता हैं। तो आप लोग गलत सोच रहें हैं | सच में, आप लोग तो अपने गाँव की अच्छाई ही बयान करते होंगे| अपने गाँव के गुणगान करते होंगे। तो आप लोग समझ ले, कि हम भी अपने गाँव की बुराई नही कर रहें है। कोई गाँव बुरा होता भी नही हैं| बुरे होते भी हैं, तो लोग होते हैं| हम तो अपने गाँव के लोगों का गुणगान कर रहे हैं। हम अपने गाँव के लोगों का इतिहास बता रहें हैं। उनकी सोच बता रहे हैं। उनके कारनामें बता रहे हैं। कइसे-कइसे लोग है हमरे गाँव में। सब के सब बवलंठ और अजीव। यहाँ के लोग अपने दुख से दुःखी नही हैं, दूसरे के सुख से दुखी हैं। जिधर भी देखो पंचायती पेलते रहते है। अपना काम छोड़कर तास के पत्ते में लग जाये तो कब सुबह से शाम हो जायेगी, किसी को शुध ही नही रहेगी, कि और भी काम करने है। यहाँ पत्ते बहुत खेले जाते हैं| पत्ते में मसरूफ लोग न जाने कब मैदान में उतर आए, ये पता नही चलता हैं, फिर अखाड़ा सुरु हो जाता है। तास के पत्ते खेलते-खेलते लोग मैदान में उतर आते हैं, युद्ध सुरु हो जाता हैं, मार-पिटाई और जुत्तम पैजार कि कोई सीमा नही होती हैं। लेकिन मेरे गाँव के लोग बड़े ही संस्कारी हैं। सुबह फिर से वही जोश के साथ सब कुछ भुला कर नई ताजगी के साथ पत्ते खेलने लगते हैं। हर एक युवा दहिला पकड़, लतड़ी, तीन पत्ती और न जाने कौन-कौन से खेल का माहिर और दीवाना है। आज जीतेंगे और कल हारेंगे लेकिन खुश है| अपना पैसा हारते है और अपनों का पैसा जीतते हैं पत्ते में, फिर भी खुश हैं। वही दस बीस रुपये के लिए पूरा दिन खपा देते हैं। यहाँ के लोग पढ़ाई में कम लड़ाई में ज्यादा ध्यान देते हैं। हम भी इसी मिट्टी में पैदा हुए हैं तो हमारा खुद का मन पढ़ने में कम लगता है, हाँ लेकिन हमें लड़ाई से डर जरूर लगइसलिए मैं कह रहा हूँ कि यहाँ के लोग सब के सब अजीब है। किसकी बहु, बेटी, पत्नी कितने बजे कहाँ जाती, कब आती है, किस से बात करती हैं, कैसे चलती, कहाँ गयी थी, क्या खाई थी से लेकर सारा का सारा बायोडाटा किसी से भी पूछ लो दो मिनट में बता देगा। चाहे उसे अपने खुद की बेटी का डेट ऑफ बर्थ न मालूम हो, लेकिन पड़ोसियों की हर एक खबर को हर एक आदमी रखता हैं, और उसे नमक मिर्च लगा कर पेश करने में लोगों को बहुत मजा आता हैं। हमारे बाबू जी हमे पढ़ने के लिए गाँव से बाहर भेज दिये थे, शायद इसलिए थोड़ा हम इनसे अलग है लेकिन अब गांव आये हैं तो देखते हैं कितने दिन में इन लोगों की संगत का असर हम पर पड़ता हैं। मुझे गांव के लोगों के बारे में जानने की उत्सुकता रहती हैं। शायद मैं भी इन्ही की तरह न हो जाऊ या गाँव का माहौल मुझे अपने माहौल में समाने की कोशिश कर रहा है। यह तो समय ही बतायेगा।ता हैं। | ैं।