あらすじ
दीबाचा हर शख़्स के अंदर एक आवाज़ होती है — एक बेचैनी, एक इज़्तिराब — जो कभी शिकायत का लिबास ओढ़ लेती है, कभी दुआ की सूरत इख़्तियार करती है; कभी उम्मीद बनकर इंतज़ार में ढल जाती है, और कभी सिर्फ़ ख़ामोशी में तमीज़ पा जाती है। मेरे लिए शायरी वही ज़रिया है, जिसके सहारे मैं अपने इस इज़्तिराब को लफ़्ज़ों का रूप देता हूँ। "इज़्तिराब: हर्फ़-ओ-दिल की दास्तान" नाम रखने का मक़सद सिर्फ़ एक जज़्बे को पहचान देना नहीं था, बल्कि उन तमाम एहसासात को एक धागे में पिरोना था जो इंसानी दिल में उठते हैं — मोहब्बत, जुदाई, तन्हाई, याद, उम्मीद, वफ़ादारी और ख़ामोशी के मुख़्तलिफ़ रंग। हर ग़ज़ल में आपको कोई लम्हा, कोई सोच, कोई एहसास ज़रूर मिलेगा — जो या तो आपने महसूस किया होगा, या फिर करने वाले हैं। शायरी मेरे लिए कोई इख़्तियार नहीं, बल्कि एक ज़रूरत थी। हर मिसरे में मेरी ज़िंदगी का कोई लम्हा छुपा है — कभी किसी अपने के ख़ामोश चले जाने का ग़म, कभी किसी की आँखों में छुपी मोहब्बत का एहसास, और कभी मेरे ही दिल से उठी वो चीख़ जो ज़ुबां तक नहीं पहुँच सकी। ये सब इस किताब के सफ़्हों में रवाँ हैं। मेरी शायरी उन सबके लिए है जो अपने एहसासात को महसूस कर सकते हैं — जिनके दिल में ज़र्रत है और लबों पर मुस्कराहट। शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ों का सिलसिला नहीं, बल्कि एक एहसास है — जो एक दिल से निकलकर दूसरे दिल तक बहता है। मुझे मुसर्रत है कि अब यह एहसास आपके हाथों में है। अगर आपने इसमें अपनी कोई कहानी ढूँढ ली, तो यही मेरे लिए सबसे बड़ा इनाम होगा। ये ग़ज़लें अक़्सर मैंने अपने कॉलेज के दिनों में लिखीं — जब जज़्बात जवान थे और इज़्तिराब गहरा। यह भी अज़्ज़ कर दूँ कि मैं पेशे से उर्दू अदब का उस्ताद नहीं, बल्कि मैकेनिकल इंजीनियरिंग का मुह्तारिज़ हूँ। इसलिए मेरी शायरी का मयार किसी अदीब या नक़्क़ाद की निगाह से नहीं, बल्कि एक महसूस करने वाले दिल की सूरत में देखा