वो जिसके नाम से लज्ज़त बहुत है उसी के ज़िक्र से बरकार बहुत है अभी सूरज ने लैब खोले नहीं हैं अभी से धुप में शिद्दत बहुत है मुझे सोने की क़ीमत मत बताओ में मिट्टी हूँ मेरी अज़मत बहुत है किसी की याद में खोये रहेंगे गुनहगारों को ये जन्नत बहुत है उन्हें मसरूफ़ रहने का मरज़ था उन्हें भी आजकल फ़ुरसत बहुत है कभी तो हुस्न का सदक़ा निकालो तुम्हारे पास ये दौलत बहुत है ग़ज़ल खुद कहके पढ़ना चाहते हो मियाँ इस काम में मेहनत बहुत है