あらすじ
प्रतिबिंब का शाब्दिक अर्थ है छवि अथवा प्रतिरूप। प्रतिबिंब पुस्तक मेरे लिए स्वरचित कविताओं का एक संकलन मात्र नहीं है बल्कि यह सम्पूर्ण जीवन की ही छवि है। जीवन में आई खुशियाँ, दुख, कष्ट, अपनत्व, ममत्व, ईश्वरीय बोध, बाल्यकाल, मित्रता और सत्य की खोज सभी कुछ इन चंद पृष्ठों में सुरक्षित है। जीवन के प्रत्येक पड़ाव में व्यक्ति को विभिन्न अनुभव प्राप्त होते हैं। जीवन की विषम परिस्थितियाँ सीख दे जाती हैं और सम परिस्थितियाँ संतुष्टि प्रदान करती हैं। इन्हीं सम-विषम परिस्थितियों का मेल ही जीवन है। जीवन का आरोह और अवरोह, दोनों ही मूल्यवान अनुभूतियाँ दे जाते हैं। इन्हीं भावानुभूतियों की देन ये कविताएं हैं जो मेरे पाठकगण के समक्ष प्रस्तुत हैं। मेरे लिए यह पुस्तक वह मुक्तमाल है जो मेरे जीवन को सार्थकता प्रदान करती है। यह न केवल मेरे जीवन का प्रतिबिंब है बल्कि मेरे पाठक भी इनमें अपनी छवि को ढूँढ पाएँगे, ऐसा मेरा विश्वास है। स्त्री हृदय बहुत ही संवेदनशील होता है। एक ओर तो वह बड़े-बड़े आघात सरलता से झेल पाने में सक्षम होता है तो दूसरी ओर, छोटी-छोटी बातें और परिस्थितियाँ भी उसका हृदय छलनी कर देती हैं। कभी वह स्त्री नन्ही बालिका समान अबोध बन जाती है तो कभी घर भर की जिम्मेदारियाँ निभाने वाली परिपक्व महिला। कभी शोकाकुल होकर वह परमेश्वर के चरणों को ही अपना आश्रयस्थल मानती है और अनंत प्रेम सागर मैं डुबकियाँ लगती है तो कभी अपने शिशु को अपने अंक में छुपाकर उसी को सम्पूर्ण सृष्टि की श्रेष्ठ रचना मानने लगती है। स्त्री के कोमल हृदय के स्पंदन को आप मेरे कविताओं के माध्यम से सुन पाएँगे। पूर्ण विनम्रता के साथ ‘प्रतिबिंब’ को मैं वागीश्वरी के चरणों में समर्पित करती हौं। अपने माता-पिता, पति और बच्चों का मैं आभार अभिव्यक्त करती हूँ जो मेरे जीवन की चुनौतियों के साक्षी हैं। अंत में, मैं दीपमिष्टि पब्लिकेशन का धन्यवाद करती हूँ जिन्होंने मेरे भावों को पुस्तक का रूप प्रदान किया। डॉ वन्दना गोसाईं