इस शीर्षक में मौन या चुप्पी का एक विशेष महत्व है, जो भीतर की आबाओं, अनकहे शब्बों, और दने हुए भावनाओं की अभिव्यक्ति को दर्शाता है। जो अक्सर शब्बों में बंभी नहीं आतीं, लेकिन जिनकी महराई इतनी अधिक होती है कि वे खुद ही बोलने लगती हैं। यह चुप्पी की एक गूंज है, जो बोलकर भी बहुत कुछ कह जाती है। कभी-कभी हमारी सबसे महरी भावनाएं और सोचने का तरीका उस जामोशी में छिपा होता है, जो खुद ही अपनी भाषा में बोलती है। यह भाननाओं, अनुभवों, और निनारों का ऐसा संग्रह हो सकता है जो पाठकों को अंदर से छू ले।