あらすじ
कश्मकश…. यह एक लफ्ज़ बड़ा अटपटा सा है,और पता नहीं क्यों मुझे इससे लगाव है। इस ‘कश्मकश’ लफ्ज़ के मतलब भी बहुत होते है। मेरी ज्यादातर लिखावट में कहीं न कहीं, जाने अनजाने ‘कश्मकश’ का आभास थोड़ा बहुत मौजूद रहता है मेरे सवालातों के रूप में। इस पुस्तक में भी ‘कश्मकश’ मौजूद है इस पुस्तक लिखावट की शुरुआत भी एक ‘कश्मकश’ से हुई थी। इस पुस्तक को लिखना जितना मुश्किल नहीं था उससे कहीं ज्यादा इसको एक नाम देना था। क्यों की इसको लिखते दरमियाँ मेरे जज़्बातों में बहुत उतार चढ़ाव आये थे, बीच बीच में कई बार लगता मैं इसे पूरा नहीं कर पाउंगी, फिर भी मैंने कोशिश की उन सभी जज़्बातों को एक साथ लिखने की और आप तक पहुचाने की। कहीं न कहीं इस पुस्तक ‘कश्मकश’ में आप खुद को मेरे साथ महसूस कर पाओगे। इश्क़, दर्द, शिकायतें, समाज, दुनियादारी इन सब का मिश्रण है यह ‘कश्मकश’। और इन सब के बीच एक इंसान यानी की मैं जो सिर्फ तुम सा है और तुम सा महसूस करता है उसे भी मैंने मेरे लफ्ज़ों में थोड़ी जगह दी है।

