あらすじ
विकास और समानता के दावों के घटाटोप के नीचे असंतोष सुलगता रहता है । राजसत्ता आँख मूँदे रहती है और स्थिरता एवं शांति का दावा करती रहती है । जब तक असंतोष को क्रोध का रास्ता नहीं मिलता, तब तक सबकुछ ठीकठाक है' का भ्रम बना रहता है । छोटे-छोटे संघर्ष चलते रहते हैं और अभिजन यथास्थिति के मुगालते में डूबे रहते हैं । इस कथ्य को आधार बनाकर लिखा गया उपन्यास । भूख स्थानीय स्तर की एक बड़ी लड़ाई की दास्तान है । बिहार का पठारी जिला पता! का गाँव खेड़ा । कागज पर शासन बिहार की सरकार का और वास्तविक कब्जा लरातू के आदमखोर कुँवर का । बचे-खुचे सामंती दलदल की उपज कुँवर की जो जंगल का राजा, जंगल के उत्पाद का लुटेरा और आदिवासियों की अस्मत को खिलौने की तरह उछालने वाला है । तेतरी के साथ बलात्कार, बेगार-बँधुआ बनाए गए आदिवासी, सुलगता असंतोष और दिशा देती परिवर्तनकामी शक्तियाँ कुँवर को चुनौती देती हैं । नौकरशाही कुँवर के सामने लाचार है । लेकिन दलितों के असंतोष का क्रांतिकारी दावानल जब भड़कता है तो कुँवर मारा जाता है । प्रख्यात बंगला लेखिका महाश्वेता देवी ने अन्याय के घृणित रूपों और उसके विरुद्ध चल रहे जन-संघर्ष की दहकती कथा पाठकों के समक्ष रखी है ।