"""समय नही है यह केवल, बैठे सर खुजाने का हाथ बढाकर दांतो से, बैठे नाखनू चबाने का समय आ गया है अब, पानी मे आग लगाने का बुझी हुई चिराग में फिर से, नई रोशनी लाने का"" दास्तां ऐ अल्फ़ाज़ के सभी पाठकों का तहेदिल से शुक्रिया, जिनके कारण हमे लिखने की प्रेरणा मिलती हैं| सभी माता-पिता, शिक्षकों, मित्रो और उन सभी को धन्यवाद जिनसे हमने जाने-अनजाने में भी बहुत कुछ सीखा है|"