あらすじ
PREFACE पुस्तक में खट्टे-मीठे हर लम्हों को 40 सुंदर कविताओं में पिरोया गया है। जीवन के अनुभवों और अपने आसपास की घटनाओं से प्रेरित होकर उन घटनाओं एवं अनुभवों को कविताओं में ढाला गया है। जहां ‘वक्त खड़ा है मौन’ कविता जो की पुस्तक का शीर्षक है, की रचना कोरोना काल में लगे लॉकडाउन के समय की गई थी और यह लेखिका के अवसाद और निराशा में डूबे मनोभाव का मार्मिक काव्य चित्रण है। ‘आज डर कुछ डरा-डरा सा लग रहा है’ में अपने अंतर्मन की आवाज़ को सुनकर डर पर विजय प्राप्त कर कामयाबी के कदम चूमने की बात कही गई है। ‘विश्वासघात’ अपने स्वजनों और विश्वासपात्र लोगों द्वारा धोखा खाने पर सचेत करती है। वही ‘मंदिर कभी कोई बना पाया’ मानव से एक प्रश्न पूछ रही है कि ईश्वर ने जिस शरीर रूपी मंदिर को हमें दिया है क्या उससे सुंदर मंदिर कोई बना पाया। फिर मंदिर के नाम पर समाज में द्वेष क्यों। ‘घर का बड़ा बेटा’ आज के आधुनिक समाज में बेटे को शिक्षा के लिए मां-बाप द्वारा बाहर भेजना और फिर बेटे द्वारा मां-बाप की बीमारी में निराशाजनक व्यवहार एवं तिरस्कार को दर्शाता बड़ा ही मार्मिक काव्य प्रस्तुतीकरण है। जो बदलते परिवेश में युवा पीढ़ी का माता-पिता की जिम्मेदारी से भागने की विचारधारा पर कुठाराघात करती है।